AMAN AJ

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आई नोट , भाग 18

    

    अध्याय 3
    दिमागी कैद
    भाग 4
    
    ★★★
    
    शख्स की कार सड़क पर चल रही थी। दिन के तकरीबन 10:00 बजे के आसपास का वक्त था। ऑफिस जाने वाले कामकाजी लोग अपने दफ्तरों की ओर जा रहे थे। शिवाय शख्स को छोड़कर। उसका ध्यान ड्राइविंग की तरफ था।
    
    ड्राइविंग करते करते उसने कंचन की तरफ देखा, सीट बेल्ट लगाने के बाद कंचन सीट पर ऐसे बैठी थी जैसे मानो किसी तरह की रोबोट हो। उसने अपने हाथों को बगल में दबा रखा था। चेहरा बिल्कुल सामने की ओर सड़क को घूर रहा था।
    
    शख्स ने अपने दिमाग में कहा “कंचन, एक छोटी लड़की, माना कि यह मेरी कहानी का हिस्सा नहीं है मगर इसका किरदार काफी इंटरेस्टिंग है। दिमागी कैद की एक जीती जागती है एग्जांपल। इस तरह के किरदार को कहानी में होना चाहिए, लेकिन तब जब किरदार का कोई मतलब बनें। खैर, एक बार इस बात को साइड में करते हैं कि इसे कहानी में होना चाहिए या नहीं, बल्कि इस बात पर चर्चा करते हैं कि आखिर इसका किरदार कहता क्या है। और फिर मैं बार-बार जिस दिमागी कैद की बात कर रहा हुं वो क्या है? सुबह इसकी मोटी मां की बातों से पता चला कि इसकी मेंटल हालत ठीक नहीं है, यह दवाइयां भी लेती है, फिर मरने मारने वाली बातें तो ऐसे करती है जैसे मानो यमराज के छुट्टी जाने के बाद उसका कामकाज इसी ने संभाल रखा है। अगर देखा जाए तो किसी को सुधरने या बिगड़ने की यही उम्र होती है, इस उम्र में अगर किसी को सही दिशा दिखा दी जाए तो उसके भविष्य का फैसला हो जाता है। यह लड़की अगर जिंदा रहती तो शायद आने वाला वक्त इसे काफी सारी अलग-अलग परिस्थितियों देखने को मिलती। उन परिस्थितियों में यह किस तरह से रिएक्ट करती यह इस बात पर डिपेंड करता की वर्तमान में से इसे किस तरह से ट्रीट किया गया। अगर इसे घर में बंद रखा गया, जैसा की अभी इसके मां-बाप इसके साथ करते हैं, तो आने वाले समय में यह खतरनाक ही बनती। क्योंकि यहां से दिमागी कैद की थ्योरी जो लागू हो जाती है।”
    
    सामने मोड़ आया और शख्स ने कार उस तरफ मोड़ ली। यह रास्ता उसके वेयर हाउस का था। एक गली जो लगभग सुनसान पड़ी रहती थी।
   
    कार उस तरफ मोड़ने के बाद उसने अपने मन में कहा “दिमागी कैद, इसे सामान्य शब्दों में समझा जाए तो यह एक ऐसी कैद होती है जिसमें हम हमारे ही विचारों में फंस कर रह जाते हैं। एक ही जगह पर कैद रहने के कारण हम बाहरी दुनिया को नहीं देख पाते, बाहरी दुनिया को ना देख पाने की अभाव में हम अपने अंदर ही एक काल्पनिक दुनिया बना लेते, फिर खुद को उस काल्पनिक दुनिया में बड़ा करते हैं, उसने बनने वाले विचारों को महत्व देते हैं, और उन्हीं के गुलाम बन जाते हैं। विचारों का गुलाम बन जाने के बाद हम किसी बेड़ियों में बंद कैदी की तरह होते हैं, जो यूं तो आजाद होता है मगर फिर भी एक बंधन हमेशा उससे जुड़ा रहता है। उसकी बेड़ीयो का बंधन। इस तरह की कैद को ही दिमागी कैद की परिभाषा दी जा सकती है। यहां हमारे विचार बेडी़यो की तरह काम करते, और आजाद होने के बावजूद हमें बांधे रखते हैं।”
    
    शख्स ने एक गहरी सांस ली “आप लोग जानते हो, मुझे भी बचपन में सुधरने का मौका मिल सकता था। जब मेरी बहन मुझे कमरे में बंद करती थी, और मुझ पर चाबुक मारती थी, शायद उस वक्त अगर वह मुझे आजाद छोड़ बाहरी दुनिया में घूमने-फिरने का मौका देती तो मैं ऐसा ना बनता। चाबुक मारने के बाद जब मैं कमरे में एक कोने पर दुबक कर रोता था, तब मेरे दिमाग में नकली दुनिया के विचार आने लगते थे। ऐसी दुनिया के जिसमें चारों ही तरफ खुशियां ही खुशियां थी। दुनिया के विचार आने के बाद मुझे लगता था कि मैं उस दुनिया को हासिल कर सकता हूं, मगर तब जब मेरे और उस दुनिया के बीच कोई रुकावट बन कर ना आए। यानी मुझ पर किसी तरह की बॉउंडेशन ना लगे। अब कंचन के साथ भी यही हो रहा है। फिलहाल इसकी उम्र कम है लेकिन जब यह थोड़ी सी और बड़ी हो जाएगी, तो यह भी अपने आसपास एक भ्रामक सी दुनिया बना लेगी। फिर जो भी इसके और इसकी भ्रामक दुनिया के बीच आएगा यह उसे मिटा देगी। हां, हां यह उसे मिटा देगी। ठीक वैसे ही जैसे मैंने मिटाया। इंसान, इंसान कभी जन्म से बुरा नहीं होता। उसे उसके आसपास के हालात और उसकी परिस्थितियां ही बुरा बनाती है।”
    
    कार उसके वेयर हाउस के पास पहुंच चुकी थी। उसने ब्रेक लगाई और कार को रोक दिया। कार के रुकते ही कंचन आसपास देखने लगी। आसपास देखने के बाद उसने कहा “यह हम कहां आ गए.... हमें तो सिनेमा जाना था।”
    
    “हां..” शख्स बोला मगर खुद में खोया हुआ “लेकिन यहां मुझे थोड़ा सा काम है, चलो तुम भी चलो, वह पूरा कर ले इसके बाद हम सिनेमा जाएंगे।”
    
    शख्स ने अपने साइड का दरवाजा खोला और कार से उतरकर नीचे आ गया। कार से नीचे उतरने के बाद उसने कंचन की तरफ का दरवाजा खोला। दरवाजा खोलने के बाद कंचन भी नीचे उतर आई। नीचे उतरने के बाद दोनों ही वेयर हाउस की तरफ चलने लगे।
    
    वेयर हाउस की तरफ चलते हुए शख्स अपने मन में बोला “अगर मैं एक बार मानवी और मानवी के आजाद होने वाले डिसीजन पर फिर से विचार करूं, तो मुझे नहीं लगता मेरा यह फैसला कहीं से भी गलत है। यानी मै इस पर शक जरूर कर रहा था, बीच-बीच में यह भी सोच रहा था कि कहीं मैंने किसी तरह की जल्दबाजी तो नहीं कर दी, मगर शायद मैंने जो भी किया वह बिल्कुल सही किया। मैंने 3 साल तक भले ही मानवी को ऐसी कैद में रखा जिसमें दीवारें तो नहीं थी मगर बॉउंडेशन थी, लेकिन अगर मैं उसे और देर तक रखता तो शायद वह भी मेरे जैसी हो जाती। दिमागी कैद में फंसी एक लड़की। उसे लगने लगता कि मैं उसके साथ जो भी कर रहा हूं वह गलत है। वह अपनी नकली दुनिया बनाती। नकली दुनिया बनाने के बाद उसमें जाने के रास्ते ढूंढती। अब रुकावट के तौर पर मैं ही उसके सामने आता, और फिर वह मुझे रास्ते से हटाने के रास्ते ढुढंने लगती। यानी हम गहराई से इसके बारे में सोचें तो दिमागी कैद जहर से भी ज्यादा खतरनाक होती है, और यहां मेरे द्वारा उठाया गया कदम बिल्कुल भी गलत कदम नहीं है।”
    
    तभी वह दरवाजे के पास पहुंचा और रुक गया। उसके रुकते ही कंचन रुक गई। शख्स ने सामने दरवाजे की तरफ देखते हुए कहा “लेकिन, मैं जो कदम अभी इस लड़की के साथ उठाने वाला हूं क्या वो सही कदम है? मतलब इस लड़की ने मेरा क्या बिगाड़ा है? हां थोड़ी सी पागल है, मगर पागल तो हर कोई होता है। कौन है इस दुनिया में जो पूरी तरह से सही है? रुको, सोचो, और देखो तुम जो करने जा रहे हो वह सही है या नहीं। मेरे ख्याल से नहीं है। यह अभी दिमागी कैद में नहीं फंसी है। एक लड़की के दिमाग में तो अभी इसकी शुरुआत ही नहीं हुई। इसे सुधारा जा सकता है। अगर इसे बाहरी दुनिया में आजाद कर दिया जाए तो यह अपने दिमाग की दुनिया में कैद होने से बच जाएगी। इसके मां-बाप नहीं जानते इसे कैसे सही किया जा सकता है, लेकिन मैं जानता हूं।” उसने कंचन की तरफ देखा “ऐसा मत करो। इसे मौका दो। भले ही तुम्हें तुम्हारी जिंदगी में मौका नहीं मिला था, मगर तुम इसके साथ अच्छा करके इसे जरूर एक बेहतरीन जिंदगी दे सकते हो। जिंदगी... तुम्हें बस जिंदगी को किसी और नजरिए से देखने की जरूरत है।”
    
    शख्स कंचन की तरफ देखता रहा। इसके बाद उसने उसका हाथ पकड़ा और पीछे की तरफ जाने लगा। वह कंचन को वापस कार की तरफ ले कर जा रहा था।
    
    कंचन ने पूछा “क्या हुआ? तुम्हें अपना काम पूरा नहीं करना?”
    
    शख्स ने ना में सिर हिलाते हुए जवाब दिया “नहीं, मैंने अपना फैसला बदल दिया है। जिंदगी... बस जिंदगी को किसी और नजरिए से देखने की जरूरत है।”
    
    “मतलब.... मैं कुछ समझी नहीं... तुम आखिर कह क्या रहे हो.... और कहना क्या चाहते हो”
       
    “तुम नहीं समझ सकती... अभी छोटी हो... बड़ी हो जाओ उसके बाद समझोगी”
    
    शख्स कार के पास पहुंचा और दरवाजा खोलकर कंचन को अंदर बैठने के लिए कहा। कंचन चुपचाप अंदर बैठ गई। उसके बैठने के बाद वह दूसरी तरफ गया और अपनी ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। 
    
    ड्राइविंग सीट पर बैठने के बाद उसने कंचन से पूछा “तुम मुवी देखना चाहती हो ना? हम मूवी देखेंगे। मगर इसके अलावा और भी ढेर सारी चीजें देखेंगे। जैसे कि जु, वाटर पार्क, काफी कुछ।”
    
    कंचन के चेहरे पर हैरानी आ गई। उसने मासूमियत से कहा “क्या सच में...!”
    
    शख्स ने अपने चेहरे पर मुस्कुराहट दिखाई और कंचन के बालों में हाथ फेरते हुए कहा “हां सच में।”
    
    इसके बाद उसने गैयर बदला और कार को आगे की तरफ चलाने लगा। आगे जाकर गली वापस मुख्य सड़क से मिल रही थी। वहां शख्स ने कार को धीरे से घुमाया और उसे सड़क पर ले लिया।
    
    तकरीबन 1 घंटे बाद वह लोग सिनेमा में बैठे मूवी देख रहे थे। शख्स ने सामने चल रही फिल्म को देखते हुए कहा “ओ गॉड, कहानियां सच में कितनी बोरिंग होती है। अगर देखना ही इतना बोरिंग लग रहा है तो पढ़ना कितना बोरिंग लगता होगा। फिर मैं भी अपनी कहानी का काम छोड़कर किधर बच्चों वाले काम में पड़ गया हूं। मगर देखा जाए तो इसमें मजा आ रहा है....” उसके हाथ में पॉपकॉर्न थे। उसने काफी सारे पॉपकॉर्न मुंह में डालें और मन में बोला “कहानी वहानी गई भाड़ में। एक बार तो जिंदगी के मजे लो। इसके भी अपने अलग मजे हैं। ऐ मानवी...” वह कुर्सी पर बुरी तरह से पसर गया “जा... तुं भी भाड़ में जा। नहीं चाहिए तू मुझे अपनी जिंदगी में। जा अपने लिए कोई लड़का ढूंढ और निकल जा उसके साथ।”
    
    मूवी खत्म होने के बाद कंचन और वह शख्स दोनों ही जु घूम रहे थे। शख्स ऐसे हरकते करने लगा था जैसे वो अब खुद ही बच्चा है। जु में काफी सारे बच्चे आए हुए थे, तो वो उन्हें ही देख देख कर बच्चों जैसी हरकतें कर रहा था। उसने एक बच्चे को दांत दिखाएं और सामान्य होकर सामने चलते हुए अपने मन में कहा “कभी-कभी बच्चा बन जाना भी दिलचस्प रहता है। मतलब बचपने के भी अपने अलग मजे हैं। ना टेंशन, ना फिकर। हां मैं कहानी से भटक रहा हूं, इन सब को मेरी कहानी में नहीं होना चाहिए था। जानता हूं...” उसने अपने दोनों हाथों को मुक्के रूप में बनाया और उन्हें चीयर्स के रूप में करते हुए कहा “मगर मैं अब खुद को कुछ अलग ही महसूस कर रहा हूं। कहां मैं कंचन की जिंदगी बदलने की बात कर रहा था... कहां खुद की ही जिंदगी बदलती हुई लग रही है। पता नहीं मैंने यह सब कैसे मिस कर दिया था। ऐसे लग रहा है जैसे मुझे लेखक नहीं बल्कि एक बच्चा होना चाहिए था। ओह, फिलिंग सो सेड फॉर माय रीडर। निब्बा निब्बा करते कहानी ही निब्बा जैसी कर दी। और मुझे भी देखो, लेखक होने के बाद भी कोई फिक्र नहीं, किसी को पढ़नी हो तो पढ़ें, किसी को ना पढनी हो तो ना पढे।”
    
    इसके बाद वह लोग वाटर पार्क चले गए। वाटर पार्क में उन्होंने दिनभर जी भरकर स्विमिंग की। मस्ती की। यह दिन शख्स और उसकी जिंदगी के लिए कुछ अलग सा ही था। कंचन तो इस सब से खुश दिखाई दे ही रही थी, शख्स भी खुद को अलग ही खुशी में महसूस कर रहा था। 
    
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1 Comments

Karan

11-Dec-2021 05:58 PM

Nice...

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